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फिल्म देखने से पहले पढ़ें कैसी है 'मर्द को दर्द नहीं होता'

28/03/2019

बॉलीवुड फिल्मों को नएपन के आधार पर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। -पहली वो, जिनकी मूल विषयवस्तु परंपरागत होती है और जिनमें कुछ नएपन के मसाले छिड़के गए होते हैं। और दूसरी वो, जिनकी मूल विषयवस्तु नएपन और अनूठेपन से लबरेज होती है और उनमें कुछ बॉलीवुड के परंपरागत मसाले छिड़के गए होते हैं। फिल्म ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ दूसरी श्रेणी की फिल्म है। इसके ‘मर्द’ यानी हीरो सूर्या (अभिमन्यु दासानी) को सचमुच दर्द नहीं होता। इसका कारण प्रचलित मुहावरा नहीं बल्कि ‘कॉनजेनिटल इनसेंसिविटी टू पेन’ नामक बीमारी है। उसे कितना भी मार लो, पीट लो, नुकीली चीज चुभो दो- उसे कुछ महसूस नहीं होता। इस अजीब स्थिति के चलते उसे मारने वाले झल्ला जाते हैं। कभी-कभार वह पीटने वालों को चिढ़ाते हुए दर्द न होने के बावजूद ‘आउच’ बोल देता है। सूर्या के मन में यह बात घर कर जाती है कि यह बीमारी एक सुपरपावर की तरह है। इस सुपरपावर को और पुख्ता बनाने के लिए वह मार्शल आर्ट सीखना चाहता है, ताकि सही वक्त आने पर दुश्मनों को मजा चखाना चाहता है। उसकी सबसे अच्छी दोस्त सुप्री (राधिका मदान) हर कारस्तानी में उसका साथ देती है। इस बीच हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि दोनों अलग हो जाते हैं। सूर्या को उसके दादाजी (महेश मांजरेकर) और पिता (जिमित त्रिवेदी) दुनिया से छुपाकर बड़ा करते हैं। पुरानी अंगे्रजी-हिंदी एक्शन फिल्में देख-देख कर सूर्या मार्शल आर्ट के कौशल सीखता है। एक कैसेट में वह मार्शल आर्ट विशेषज्ञ मणि (गुलशन देवैया) को देखता है और उसका मुरीद हो जाता है। एक पैर से लाचार होने के बावजूद मणि मार्शल आर्ट में अकेले 100 लोगों को हरा चुका है। मन ही मन सूर्या उसे अपना गुरु मान लेता है। इन्हीं गुरु का लाल चश्मे वाला हमशक्ल भाई जिमी (गुलशन देवैया) कहानी का विलेन है, जो एक बड़ी सिक्योरिटी कंपनी चलाता है।











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