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योगी सरकार को लगा तगड़ा झटका ! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पोस्टर तुरंत हटाने के दिए आदेश !

09/03/2020

सीएए के विरोध में हुए आंदोलन के दौरान हुई हिंसा को जिम्मेदार ठहराते हुए आंदोलनकारियों की संपत्ति जप्त करने के लिए उनकी तस्वीरों वाले पोस्टर सार्वजनिक जगहों पर लगाए जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ के ज़िलाधिकारी और पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया है कि लखनऊ में प्रदर्शनकारियों की तस्वीरों और उनके पते लगे हुए पोस्टर्स और होर्डिंग्स को 16 मार्च तक हटा लिया जाए. मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और जस्टिस रमेश सिन्हा की बेंच ने ये निर्देश देते हुए 17 मार्च तक कार्रवाई रिपोर्ट रजिस्ट्रार जनरल के दफ़्तर में जमा कराने का निर्देश दिया है. कोर्ट परिसर में मौजूद वकील एसएम नसीम ने मीडिया को बताया कि हाईकोर्ट ने इस मामले में बेहद सख़्त रुख़ अपनाया और कहा कि ये नागरिकों की निजता का हनन है और इन्हें तत्काल हटा लिया जाए. नसीम ने बताया कि राज्य सरकार के महाधिवक्ता की ओर से इस बारे में दी गई दलीलों को कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया और पोस्टर्स लगाने को नागरिकों की निजता का हनन माना है. कोर्ट के इस आदेश पर राज्य सरकार की अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है. हाईकोर्ट के आदेश के बाद रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी ने बीबीसी से बातचीत में कोर्ट के इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इस फ़ैसले से लोगों का क़ानून पर भरोसा बढ़ा है. दारापुरी का नाम भी उन लोगों में शामिल है जिनकी तस्वीरें होर्डिंग्स पर लगाई गई हैं. दारापुरी कहते हैं, "हाईकोर्ट ने बता दिया है कि प्रदेश में क़ानून का राज चलेगा और न कि योगी आदित्यनाथ की तानाशाही. लगता है कि योगी सरकार हम लोगों की मॉब लिंचिंग कराने की तैयारी कर रही है. हम दोषी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग करेंगे और इसके लिए अदालत की शरण लेंगे." इससे पहले, रविवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में ख़ुद संज्ञान लेते हुए लखनऊ के ज़िलाधिकारी और पुलिस आयुक्त को सुबह दस बजे अदालत में तलब किया. रविवार होने के बावजूद हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस गोविंद माथुर ने मामले की सुनवाई की. लखनऊ के ज़िलाधिकारी के ख़ुद न पहुंचने और अपर ज़िलाधिकारी को भेजने पर कोर्ट ने सख़्त नाराज़गी जताई और राज्य के महाधिवक्ता समेत सभी संबद्ध अधिकारियों को रविवार शाम तीन बजे दोबारा सुनवाई के वक़्त उपस्थित रहने का निर्देश दिया. रविवार को सुनवाई के वक़्त अदालत परिसर में मौजूद रहे इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एसएफ़ए नक़वी ने बीबीसी को बताया, "सबसे अहम सवाल कोर्ट ने पूछा कि आपने किस अधिकार से ये नोटिस जारी किए हैं और ये होर्डिंग्स लगाए हैं. कोर्ट ने जवाब देने के लिए महाधिवक्ता और ज़िलाधिकारी को ख़ुद मौजूद रहने को कहा और उनकी मौजूदगी के लिए तीन बजे तक की मोहलत दी. सोमवार को अदालत ने फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था." नक़वी के मुताबिक, क़रीब एक घंटे की सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार से कई सवाल पूछे जिनका जवाब सरकार की तरफ़ से दिया गया. नक़वी ने बताया कि महाधिवक्ता की ओर से यह सवाल भी किया गया कि लखनऊ का मामला इलाहाबाद में क्यों सुना जा रहा है. इस पर हाईकोर्ट का कहना था कि पूरा प्रदेश उनके अधिकार क्षेत्र में है और वो कहीं भी सुनवाई कर सकते हैं. नक़वी का कहना था, "राज्य सरकार के वकील की ओर से संपत्ति के नुक़सान की वसूली के अधिकार की बात की गई जिससे कोर्ट ने सहमति जताई लेकिन कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि ऐसा आप सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार ही कर सकते हैं. ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकते जिससे किसी कि निजता का हनन हो और उसकी सुरक्षा को ख़तरा पैदा हो जाए." इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस निर्णय से योगी सरकार को तगड़ा झटका लगा है।











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